१८५७

राजस्थान और 1857 की क्रांति

History

राजस्थान में 1857 की क्रांति

1857 की क्रांति अंग्रेजों की 100 साल की सत्ता का परिणाम थी। भारत में 1857 की क्रांति की शुरुआत मेरठ से 10 मई 1857 को मानी जाती है।  

तत्कालीन कारण चर्बी वाले कारतूसो का मंगलपांडे द्वारा विरोध करना। रोटी और खिलता हुआ कमल को अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति का प्रतीक माना। अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति के समय भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड केनीन थे।  राजस्थान के AGG सर सर पैट्रिक लॉरेंस थे।  

19 मई 1857 को राजस्थान के एजीजी को भारत में क्रांति की सूचना। सर पैट्रिक लॉरेंस ने राजस्थान की सभी रियासतों को अपने क्षेत्र में शांति व्यवस्था बनाए रखने व क्रांतिकारियों का सहयोग न करने की हिदायत दी।  

1857 में राजस्थान में 6 सैनिक छावनी स्थित थी :-
१.नसीराबाद २.नीमच   ३.ब्यावर, 
४.देवली   ५.एरिनपुरा ६.खेरवाड़ा 

नीमच ( मध्य प्रदेश ) एकमात्र छावनी राजस्थान की सीमा से बाहर स्तिथि थी। 

नसीराबाद का विद्रोह 28 मई 1857 

अजमेर में तैनात हाल ही में मेरठ से आई हुई 15 वी N.I. बटालियन के सैनिकों को वहां से हटाकर नसीराबाद भेज दिया गया।  

नसीराबाद में उन सैनिकों के साथ दुर्व्यवहार किया गया। इस इन्फेंट्री ने 28 मई को नसीराबाद में क्रांति की शुरुआत कर दी। क्रांतिकारियों ने नसीराबाद में न्यूसेरी व स्पोटिस की गोली मारकर हत्या कर दी।  

बख्तावर सिंह नामक सैनिक ने यहां से विद्रोह का नेतृत्व किया।  

नीमच का विद्रोह 3 जून 1857 

नीमच के सैनिकों ने 3 जून को विद्रोह किया। क्रांतिकारियों ने नीमच स्थित रेजिडेंट में 40 अंग्रेज परिवारों को डूंगला नामक स्थान पर बंदी बना लिया।    नीमच के सैनिकों का नेतृत्व मोहम्मद अली बैग वह हीरा सिंह ने किया।  

नीमच छावनी का मुख्य अधिकारी मेजर लायर्ड था।  नीमच छावनी मेवाड़ रियासत के अधिकार क्षेत्र में थी।   मेवाड़ के महाराणा स्वरूप सिंह व मेवाड़ के पोलिटिकल एजेंट शावर्स के द्वारा इन अंग्रेज परिवारों को क्रांतिकारीयो से आजाद कराकर उदयपुर में पिछोला झील के जग मंदिर में शरण दी गई।  

एरिनपुरा का विद्रोह 21 अगस्त 1857 

एरिनपुरा में जोधपुर रीजन के सैनिक तैनात थे यहां के पूर्णिया सैनिकों ने 21 अगस्त को विद्रोह कर दिया ठाकुर शिवनाथ सिंह के नेतृत्व में ” दिल्ली चलो फिरंगी मारो ” सैनिकों के द्वारा नारा दिया गया। एरिनपुरा के सैनिक पाली पहुंचे जहां के ठाकुर कुशाल सिंह चंपावत ने उनको शरण दी।  

8 सितंबर 1857 बिठुड़ा का युद्ध 

मारवाड़ के शासक तखतसिंह व अंग्रेजों की संयुक्त सेना तथा ठाकुर कुशाल सिंह के मध्य बिठुड़ा का युद्ध हुआ। 

अंग्रेज सेनापति कैप्टन हीथकोट व तखत सिंह की तरफ से सेनापति औनाड़सिंह और कुशाल सिंह के मध्य युद्ध हुआ।  ठाकुर साहब की विजय हुई।

छैलावास (काला- गोरा) का युद्ध 18 सितंबर 1857 

इस युद्ध में राजस्थान का AGG सर पैट्रिक लॉरेंस उपस्थित था। आहुवा के ठाकुर तथा संयुक्तसेना के मध्य युद्ध हुआ। 

जोधपुर के पोलिटिकल एजेंट मेकमोसंस की हत्या कर क्रांतिकारियों ने उसे द्वार पर लटका दिया। ठाकुर साहब की जीत हुई ।

ठाकुर कुशाल सिंह की आराध्य देवी सुगाली माता  ( क्रांति की देवी ) का उन्हें आशीर्वाद प्राप्त था। लॉर्ड कैनिंन के द्वारा कर्नल होम्स के नेतृत्व में आहुवा पर सैनिक कार्रवाई की जाती है ठाकुर कुशाल सिंह आहुवा दुर्ग की जिम्मेदारी ठाकुर पृथ्वी सिंह को सौंपकर कोठारिया के ठाकुर जोध सिंह की शरण में चले जाते हैं। 

1860 में ठाकुर कुशाल सिंह के द्वारा आत्मसमर्पण कर दिया जाता है, कुशाल सिंह के अपराधों की जांच के लिए मेजर टेलर की अध्यक्षता में आयोग द्वारा उन्हें दोषमुक्त करार कर दिया जाता है।  

एरिनपुरा छावनी में विद्रोह का नेतृत्व सूबेदार शीतलप्रसाद, मोती खान व तिलकराम ने किया। आहुवा पहुंचने पर ठाकुर शिवनाथ सिंह ने नेतृत्व किया।  

नवम्बर 1857 कैप्टन गर्राड के नेतृत्व में क्रांतिकारियों का दमन किया गया।  

देवली छावनी का विद्रोह 10 जुन1857

कोटा का विद्रोह 15 अक्टूबर 1857

 कोटा के महारावल राम सिंह को क्रांतिकारियों द्वारा नजरबंद कर दिया गया, क्रांतिकारियों का नेतृत्व वकील लाला जय दयाल और मेहराब खान ने किया। कोटा के पोलिटिकल एजेंट की हत्या कर क्रांतिकारियों ने उसके सिर को भाले में रखकर पूरे कोटा शहर में घुमाया। 

सेनापति रॉबर्टसन ने करौली के शासक मदनपाल की सहायता से कोटा को क्रांतिकारियों से मुक्त कराया और महारावल को आजाद कराया। लाला जय दयाल व मेहराब खां  को फांसी दे दी गई। अंग्रेजों ने राम सिंह की तोपों की सलामी घटा दी तथा करौली करौली के शासक मदन पाल की तोपों की सलामी बढ़ा दी। 

टोंक का विद्रोह 

राजस्थान की एकमात्र मुस्लिम रियासत का तत्कालीन नवाब वजीरुदौला,अंग्रेजों का हितेषी था। टोंक का विद्रोह का नेतृत्व मीरआलम खान नामक सेनापति ने किया।  

तात्या टोपे – रामचंद्र पांडुरंग 

नाना साहब के सेनापति और ग्वालियर राज्य से संबंधित। राजस्थान में सर्वप्रथम 8 अगस्त अट्ठारह सौ सत्तावन को भीलवाड़ा में (कुल 2 बार) आए।  

तात्या टोपे के विश्वासघाती मित्र मान सिंह नरूका ने उन्हें अंग्रेजों के हाथों पकड़ा दिया तात्या टोपे को क्षिप्रा मध्यप्रदेश में फांसी दे दी गई।  

राजस्थान की एकमात्र शासक सरदार सिंह ( बीकानेर ) ने इस क्रांति में अंग्रेजों की सहायता के लिए अपनी सेना लेकर राज्य से बाहर गए। 

भारत के प्रथम वायसराय लॉर्ड केनिंन ने कहा कि 

इस क्रांतिनामी तूफान के आगे भारतीय रियासत के राजाओं ने बांध के रूप में कार्य किया नहीं तो यह तूफान अंग्रेजों को भारत से बाहर बहाकर ले जाता।

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