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मारवाड़ के राठौड़ राजवंश । Marwar ke Rathour

History Rajvansh

जोधपुर का राठौड़ राजवंश

जोधपुर का राठौड़ राजवंश कन्नौज के सांसद जयचंद से संबंधित है।   

1194 चंदावर के युद्ध में मोहम्मद गोरी से जयचंद की पराजय होती है और गहड़वाड वंश का अंत होता है। 

जयचंद गहड़वाड के पौत्र राव सिहा जी मारवाड़ के राठौड़ों के मूल पुरुष, आदि पुरुष व संस्थापक माने जाते हैं। राव सिहा जी सर्वप्रथम बीकानेर के स्थान कोलुमण्ड नामक स्थान पर आए। 

राठौड़ राजवंश को कर्नल जेम्स टॉड ने सूर्यवंशी माना तथा मुहनोत नेनसी ने इन्हें जयचंद गढ़वाल का वंशज माना। 

राठौड़ों के अगले शासक आसनाथ के पुत्र धुहड़ ने राठौड़ों की कुलदेवी नागणेचिया माता ( नागाणाराय, चक्रेश्वरी माता ) की मूर्ति को कर्नाटक से लाकर मारवाड़ में स्थापित किया। 

राव चुंडा

राव चुंडा के पुत्र रणमल थे जिनकी हत्या मेवाड़ में की गई। राव चुंडा को मंडोर के इंदा वंश राजपूत शासक ने अपनी पुत्री के दहेज में मंडोर रियासत का उपहार दिया।

राव जोधा 1438 -1489

रणमल की मृत्यु के समय जोधा मेवाड़ में उपस्थित थे।  1459 में मेहरानगढ़ दुर्ग का निर्माण कर जोधपुर की स्थापना की। मेहरानगढ़ दुर्ग चिड़ियाटूक  पहाड़ी पर बना है।  इस दुर्ग के अन्य नाम मयूरध्वज, गढ़चिंतामणि व सूर्यमुखी है। इस दुर्ग की नींव की स्थापना रिद्धि बाई  ( करणी माता ) के हाथ से हुई।

इसकी नींव में जीवित व्यक्ति राजा राम को चुनवाया गया। 

जसवंतसिंह

जसवंत सिंह के दीवान थे मुहणोत नेणसी जिन्हें मारवाड़ का अबुल-फजल कहा देवी मुंशी प्रसाद ने। राजस्थान में जनगणना का अग्रज मुहनोत नेणसी को माना जाता है। 

जसवंत सिंह द्वारा रचित रचनाएं

भाषा भूषण

गीता महात्म्य 

आनंद विलास। 

अजीत सिंह 1678 – 1724

अजीत सिंह व मुगलों के मध्य लंबा प्रतिरोध चला।  औरंगजेब के समय मारवाड़ की रियासत लगभग 30 साल तक खालसा बनी रही। 

1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद अजीत सिंह मारवाड़ के शासक बने अजीत सिंह को मुगलों की चुंगल से वीर दुर्गादासमुकंददास खींची बचा कर लाए। 

मारवाड़ के इतिहास में वीर दुर्गादास नाम अमर है।

अजीत सिंह की धाय गौरा धाय ने अपने पुत्र का बलिदान देकर अजीत सिंह की जान बचाई। 

      ” मारवाड़ की पन्नाधाय – गौराधाय “

वीर दुर्गादास राठौर 

जन्म – सालवा कला गांव ( जोधपुर )

पिता – आसकरण

मृत्यु  – क्षिप्रा नदी के किनारे ( उज्जैन )

उज्जैन में इनकी छतरी बनी हुई है। 

अजीत सिंह के द्वारा इन्हें मारवाड़ से निष्कासित कर दिया गया कर्नल जेम्स टॉड ने वीर दुर्गादास को “राठौड़ों का  यूलीसेस” कहा। 

अजीत सिंह के समय आमेर, मेवाड़ और मारवाड़ के मध्य देबारी समझौता संपन्न हुआ था अजीत सिंह ने अपनी पुत्री का विवाह मुगल शासक फर्रूखसियर के साथ किया बख्तसिंह ने अपने पिता अजीत सिंह की हत्या कर दी। बख्तसिंह दूसरा पितृहन्ता।

अभय सिंह 1724 – 1741

अभय सिंह के शासनकाल में जोधपुर की प्रसिद्ध खेजड़ली ग्राम की घटना घटित हुई। 

अमृता देवी ने खेजड़ली आंदोलन का नेतृत्व किया। 

अभय सिंह के शासनकाल में मारवाड़ में ख्यात लिखने का कार्य अत्यधिक रूप से विकसित हुआ अभय सिंह के दरबारी कवि करणी दान ने सूरज प्रकाश नामक ग्रंथ लिखा। 

विजय सिंह प्रथम

विजय सिंह के शासनकाल में मारवाड़ व  मराठों में संधि संपन्न हुई। विजय सिंह के द्वारा जयप्पा सिंधिया की हत्या कर दी जाती हैं। विजय सिंह की पासवान गुलाब राय द्वारा जोधपुर में गुलाब सागर का निर्माण कराया जाता है। 

कवि श्यामल दास ने गुलाब राय को मारवाड़ की नूरजहां कहा। 

मानसिंह 1803 – 1843

मानसिंह स्वयं नाथ संप्रदाय के अनुयाई थे। इनके गुरु नाथ संप्रदाय से संबंधित गोरखनाथ पंत के “आयस देवनाथ ” जी थे। 

मानसिंह को सन्यासी राजा भी कहा जाता है । इन्होंने नाथ संप्रदाय की प्रमुख पीठ जोधपुर के महामंदिर में स्थापित की।  

जोधपुर दुर्ग में मान प्रकाश नामक पुस्तकालय की स्थापना की।  

12 मार्च 1807 ई. को परबतसर में “ कृष्णाकुमारी विवाह ” विवाद को लेकर मान सिंह व जगत सिंह के मध्य गिंगोली का युद्ध हुआ। 

1818 ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि पर मानसिंह के द्वारा हस्ताक्षर किए गए।

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